व्यंग्य
प्रभात गोस्वामी
कोरोनाकाल भी क्या-क्या गुल खिला रहा है ? बच्चों की शालाओं पर ताले लगे हैं और मधुशालाएँ गुलज़ार हो उठीं हैं . सड़कों पर दो-तीन किलोमीटर लम्बी कतारें . क्या ग़रीब और क्या अमीर सब एक ही लाइन में दिखाई पड़ रहे हैं . लोकतंत्र की सच्ची तस्वीर . कविवर हरिवंशराय बच्चन जी की दूर दृष्टि को बार-बार नमन कर रहा हूँ . दुश्मन और दोस्त एक लाइन में . "बैर बढ़ाते मंदिर –मस्जिद , मेल कराती मधुशाला" . देश और राज्यों की लड़खड़ाती अर्थ व्यवस्था को अब लड़खड़ाते पैर आगे बढ़ने का संबल देंगे !
ज़ाम है तो जहाँन है की तर्ज़ पर देश की सड़कों पर जाम लग गया . अचानक खाली सड़कें खुशियों से चहक उठीं . मधुशाला का आकर्षण देखिये . ग़रीब रोटी छोड़कर दारू की लाइन में लगा हुआ था . कुछ भाई झूमते हुए यह भी कहते पाए गए कि सरकारों ने कोई भूखा न सोए की व्यवस्था के बाद अब कोई 'प्यासा' न सोए इसकी व्यवस्था भी कर दी है . जी करता है छत पर चढ़कर थाली बजाएं और फूल बरसाएं .
मधुशाला में लम्बी-लम्बी कतारें देख कर लोगों को भ्रम भी होने लगा, कहीं चुनाव तो नहीं हो रहे ? लाईनों को देखकर मतदान केन्द्रों जैसा दृश्य देखने को मिल रहा था . सच है कि मधुशालाओं में दूरियां नजदीकियां बनतीं रहीं हैं . ये भी अज़ब इत्तेफाक़ है . फिर सोमरस पीने के बाद कोई दूर-दूर कैसे रह सकता है ! झूमने वालों को कहाँ पता चलता है कि वो किस-किस से लूम रहे हैं ! वैसे भी शराबियों से सबने सोशल डिस्टेंस बनाया हुआ ही है . इनका अपना सोशल सर्कल है .
एक बेवड़ा बड़ा दुखी हो कर बोला- पुलिस ने लाठियां भांज इस रसपान में खलल डाल कर अच्छा नहीं किया . कोरोना से मरने का डर किसे है ? हम तो मरते वक्त भी गंगाजल की जगह मुंह में दो बूंद मदिरा टपकाने में यकीन रखते हैं . कोरोना की क्या मज़ाल जो इस घूंट के आगे ठहर जाए ! सोमरस का स्वाद तो धरती से स्वर्ग तक लिया जाता रहा है .
धुत्त हो कर दूसरा बड़बोला आगे आया . उसने अपने ज्ञान का ढक्कन खोलते हुए बताया - दारू लोकतंत्र का पांचवां खम्भा है . सरकारों को सबसे अधिक राजस्व हमारी वजह से ही तो मिलता है . हम लड़खड़ा कर गिरते हैं तभी तो अर्थ व्यवस्था मजबूती से खड़ी होती है . पर, बाबू मोशाय, यह भी दारू की तरह कड़वी सच्चाई है कि इस बोतल में कितने ही परिवारों की सिसकियाँ बंद पड़ी हैं , बर्बादी के किस्से हैं . पता नहीं शराब के नशे में बर्बाद हो कर कब तक हम आबाद होने का झूठा सपना देखते रहेंगे ! अबे, कब से कह रहा हूँ , बस कल आखिरी बोतल होगी . अब ये कल आता क्यों नहीं ?
इस भीड़ में पहले घूंट का अनुभव लेने वाले खुलकर अंग्रेज़ी (?) बोलते हुए लोगों से यह भी कहते नज़र आए – कीप हिचटेन्स , हिच.. ज़िंदगी विल नेवर मिलेगी दोबारा . कीप...कीप हिचटेन्स...प्लीज् !! धड़ाम की आवाज़ के साथ भाई चारों खाने चित्त हो गए . लोग उनके ऊपर से निकलते हुए लाइन में धक्का-मुक्की करते रहे . दुनिया जाए भाड़ में . मधुशाला चालू आहे !!
प्रभात गोस्वामी ,
15/27, मालवीय नगर , जयपुर (राजस्थान)